शनिवार, 7 मार्च 2015

samay: ”दीमापुर का न्याय“

samay: ”दीमापुर का न्याय“: दीमापुर में भीड का अपना न्याय सम्पन्न हुआ, निर्भया कांड के दौरान भी जिस तरह भीड द्वारा अपराधी को हवाले करो के जो नारे लगाये जा रहे थे कि वे...

”दीमापुर का न्याय“

दीमापुर में भीड का अपना न्याय सम्पन्न हुआ, निर्भया कांड के दौरान भी जिस तरह भीड द्वारा अपराधी को हवाले करो के जो नारे लगाये जा रहे थे कि वे उग्र होकर अपनी चरम परिणति तक पहुॅचे। अब अपराधी को दण्ड देने का अधिकार भीड के हाथ में आ गया लगता है,  वह इतनी दुस्साहसी हो चुकी है कि अपराधी को जेल से भी बाहर खींच कर मार डालने में भी सक्षम है, इस घटना से  यह साबित हो चुका है। भीड द्वारा सम्पादित इस कथित न्याय के जो खुलासे सामने आ रहे है उससे इस बात को बल मिलता है कि बलात्कार ”निर्भयाओं“ के साथ ही नहीं ही नहीं ”निर्भय“ भी बलात्कार के नाम पर मारे जा रहे है। एक आदमी को इस तरह खींच कर कैसे मारा जा सकता है? हमारे सामने सबूत है कि महिलायें भी झूठी,हत्यारिन,फरेबी और धोखेबाज  हो सकती हैं, गुजरात दंगों की एक चश्मदीद महिला गवाह ने किस तरह पैसे लेकर पीडितों के नाम पर सौदे बाजी की,अपना ईमान बेचा, महिला होने,अल्पसंख्यक होने सहित सभी बातों का भरपूर फायदा उठाया यह अदालती प्रमाण से भी साबित हो चुका है। इसलिए महिला अधिकार की आडम्बरपूर्ण बातें करने वालों को इन अपराधों की भी जिम्मेदारी लेनी होगी और जवाब देना होगा कि दीमापुर की इस लडकी ने किन परिस्थितियों में पूरे देश को शर्मसार करने वाली हरकत की और उस लडके को मरवाने में भूमिका अदा की जिसके साथ उसके कथित सम्बन्ध रहे थे। दहेज एक्ट के नाम पर हजारों बूढे सास-ससुर आज जेलों में बंद हैं अब अदालत ने इसमे नरमी बरतने के निर्दैश दिये हैं इसी तरह दलित एक्ट का भी दुरूपयोग होने के बाद उसे संशोधित किया गया । कहने का मतलब है कि हम समस्या को इस तरह हल करते हैं कि उससे समस्या कई गुना जटिल हो जाती है। अन्याय,अत्याचार को हम जाति,धर्म,लिगंभेद के आधार पर नहीं रोक सकते हैं और ना ही इस तरह किसी के लिए कोई अभयारण्य बनाया जा सकता है। कम से कम आज महिला दिवस की अगुआई वे लोग कर रहे हैं जिनकी समझ परम्परागत, रूढीवादी ट्रेडयूनियन नेताओं जैसी ही है, जिन्हें लगता है कि सारी दुनियां फैक्ट्री मालिक और मजदूरों में बॅटी है जिसमें पुरूष और महिलाओं के बीच सम्बन्ध फैक्ट्री मालिक और फैक्ट्री मजदूर के ही है। महिला दिवस अथवा मजदूर दिवस का मतलब इतना ही था कि एक मजदूर के नजरिए से दुनियां को कितना खूबसूरत बनाया जा सकता है।  और एक महिला के स्वप्न में यह दुनियां कितनी खूबसूरत हो सकती है इसे समझने की बजाए पूरे बगीचे को लडाई के मैदान में बदला जा रहा है। मानसिक दिवालिया लोग आज जमाने के रहनुमा बन गये हैं ।




शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

samay: देश को नहीं व्यवस्था को मोदी की जरूरत है।

samay: देश को नहीं व्यवस्था को मोदी की जरूरत है।: दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में नरेन्द्र मोदी के सम्बोधन, आर0एस0एस0 द्वारा उनके समर्थन और कुंभ मेले में आयोजित विश्व हिन्दु परिषद की धर्म...

samay: देश को नहीं व्यवस्था को मोदी की जरूरत है।

samay: देश को नहीं व्यवस्था को मोदी की जरूरत है।: दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में नरेन्द्र मोदी के सम्बोधन, आर0एस0एस0 द्वारा उनके समर्थन और कुंभ मेले में आयोजित विश्व हिन्दु परिषद की धर्म...

देश को नहीं व्यवस्था को मोदी की जरूरत है।

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में नरेन्द्र मोदी के सम्बोधन, आर0एस0एस0 द्वारा उनके समर्थन और कुंभ मेले में आयोजित विश्व हिन्दु परिषद की धर्म सभा में जिस तरह मोदी की रणनीति सफल होती दिख रही है उससे जाहिर है कि सब कुछ उनके पक्ष में जाता दिख रहा है बात यहीं तक सिमित नहीं है उनके तथाकथित विरोधि भी उनके लिए ही काम कर रहे हैं जिससे उनका प्रचार फैलता ही जा रहा है इस कारण  सुर्खियों में बने रहने की उनकी नीति सफल हो रही है, बाजार के इस दौर में सुर्खियॉ बटोर लेना काफी हद तक सफलता मानी जाती है। सवाल उठता है कि मोदी विरोधी भी उनके लिए कैसे सहयोग कर सकते हैं? मोदी का विरोध करने वालों में कोई गम्भीरता नहीं है और ना ही कोई स्पष्ट समझ है उन्हें पता नहीं कि मोदी देश को किधर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। वे सिर्फ मोदी को मुसलमान विरोधी की तरह पेश कर रहे हैं इससे मोदी और भी प्रचारित हो रहे हैं मोदी की भी यही राजनीति है कि मुसलमानों को मुद्दा बनाकर वोटों का धुव्रीकरण कर लिया जाए जिसे वे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का जामा पहना रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि मोदी को हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की कोई समझ हो। यह सब हवा-हवाई नारा ही है। सवाल उठ सकता है कि कांग्रेस ,वामपंथी और मुलायम सिंह टाईप की राजनीति मोदी के सामने इतनी दयनीय क्यों हो गयी है? पहली बात तो यह है कि इनकी भी राजनीति मोदी जैसी ही रही है फर्क केवल इतना है कि ये लोग अल्पसंख्यकवाद की राजनीति करते रहे और मोदी बहुसंख्यकवाद की नारा दे रहे हैं इसलिए राजनीति से उकताये लोगों के सामने यह नई डिश की तरह है। दूसरी बात यह है कि देश की स्थितियां इतनी खराब हो चुकी है कि लोग सडकों पर न उतर आयें जैसा कि मध्य पूर्व में हो रहा है और यूरोप ,अमेरिका सहित पूरी दुनियां में जैसा संकट व्याप्त होता जा रहा है उससे बचने का किसी भी राजनीतिक दल के पास कोई मार्ग नहीं है इसलिए यदि मोदी जनमानस को नया नारा दे पाते हैं तो कांग्रेस को भी कोई दिक्कत नहीं है वे इसमें मदद भी कर सकती है कम से कम यह व्यवस्था तो बची रहेगी। महान अर्थशास्त्री और ईमानदार छवि का मनमोहनी तिलिस्म अब टूट चुका है। इनकी योग्यता  का यह परिणाम है कि विकास दर के मामले में अब बंगलादेश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। मोदी ने उन सारे सवालों को पीछे छोडने में सफलता प्राप्त कर ली है जो कि चुनावों में मुख्य मुद्दा बन सकते थे ।बढती मंहगायी,सामाजिक असुरक्षा,दिशाहीनता फैलता जनअसंतोष, भयावह बेरोजगारी समेत सभी संस्थाओं के होते जा रहे पतन के कारण इन सभी राजनीतिज्ञों को कठिनाई हो सकती थी । लेकिन अब ये सभी मुद्दे पृष्ठभूमि में जाते दिखाई दे रहे हैं और सभी राजनीतिक पार्टियां इस बात से राहत महसूस कर रही हैं कि सामूहिक जवाबदेही की उलझन से मोदी ने सबको उबार लिया है इसलिए सभी किसी न किसी रूप में उनका सहयोग कर रहे है। यहॉ तक की तथाकथित धर्म सभायें भी। इन धर्मसभाओं ने लाखों किसानों की आत्महत्याओं पर कभी कोई बयान तक नहीं दिया, आर्थिक नीतियों के कारण देश लगभग गुलाम होने के कगार पर जा पहुॅचा है इस पर इनकी कोई सभा नहीं हुई लेकिन मोदी पर इतनी उत्सुकता के पीछे कारण स्पष्ट है कि साधु-सन्यासी भी इसी व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं आखिरी उनके भी अपने मठ मन्दिरों की व्यवस्था का सवाल है।

सोमवार, 13 अगस्त 2012

मकसद है विपक्ष बनना, राम देव हो चाहे टीम अन्ना!

अन्ना टीम और रामदेव के आंदोलन ठहराव का शिकार हो चुके हैं कहा जा सकता है कि कोई भी बाहरी ताकत इस ठहराव के लिए कसूरवार नहीं है इसके लिए इनकी आंतरिक गति ही जिम्मेदार है।कहने को तो अन्ना टीम सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल लाने से इसकी शुरूआत करते हुए दिखती है, और रामदेव कालेधन के मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं। वास्तव में जैसा इन आंदोलनों का स्वरूप दिखता है वैसा है नहीं। ये दोनों आंदोलन मूलतः सरकार के खिलाफ नहीं है और न ही सिस्टम के खिलाफ हैं क्योंकि अन्ना टीम के पास लोकपाल से आगे की कोई योजना, तस्वीर और कार्यक्रम नहीं है और रामदेव का आंदोलन तो केवल कालेधन के मुद्दे तक ही सीमित हैं इससे आगे वे कुछ कहते ही नही हैं। वास्तव में ये दोनों आंदोलन इसलिए पैदा हुए हैं क्योंकि हमारे देश में विपक्ष की जगह खाली पडी थी ,दक्षिणपंथी हों वामपंथी हो या मध्यमार्गी सभी वैचारिक दिवालिएपन से ग्रस्त हैं इसलिए इनकी भूमिका किसी को तो निभानी ही है यही सोचकर केजरीवाल, किरण बेदी और रामदेव जैसे लोग अपनी किस्मत आजमाने राजनीति के मैदान में कूद पडे हैं लेकिन राजनीति को कुछ सकारात्मक दें सके यह इनकी सामर्थ्य नहीं है। टीम अन्ना और रामदेव इस आपाधापी में है कि किसी तरह इस रिक्त स्थान पर अपना कब्जा कर लिया जाए इससे अधिक इन आंदोलनों में कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती है। अन्ना और अन्ना टीम में तो कुछ-कुछ वैचारिक और सैद्धान्तिक मतभेद है जिसका संघर्ष समय-समय पर सतह में दिखता रहता है लेकिन राम देव तो खुलेआम भारतीय जनता पार्टी के लिए ही काम कर रहे हैं इसमें थोडी बहुत इनकी निजी महत्वकांक्षा भी काम कर रही है लेकिन मूलतः रामदेव का आंदोलन भाजपा का ही आंदोलन है जो चाहती है कि  पिछले दरवाजे से अंादोलनों में संेध लगाये रखी जाए। भाजपा के लिए रामदेव से बेहतर कोई विकल्प नहीं था, इससे दोनों के स्वार्थों की पूर्ती हो रही है।
              सवाल यह उठता है कि अन्ना और अन्ना टीम के बीच का संघर्ष और इनकी स्थिति क्या है। अन्ना टीम में वे लोग है जो हमारे देश के मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के बीच पनपे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, केजरीवाल और किरण बेदी जैसे लोग जो खुद बडे-बडे एन0जी0ओ0 चलाते हैं और इनकी आथर््िाक स्थिति इतनी मजबूत है कि सरकार के एक नोटिस पर दस-बीस लाख रूपये यॅू ही जमा कर देते हैं। दरअसल ये वर्ग नई आर्थिक नीतियों के बाद पैदा हुए धनवानों का प्रतिनिधि है। इसमें अचानक उॅची हो गयी तनख्वाह पाने वाले लोग और दूसरे रहस्यमय तरीकों से इसी तरह रातों-रात अमीर हो गये लोगों की नैतिक दुहाई भर है। ये लोग अन्ना को अपने ब्रान्ड ऐम्बेसडर के तौर तक ही सीमित करना चाहते हैं लेकिन अन्ना अपनी सीमाओं के बावजूद इन सब में उम्मीद की किरण है। अन्ना टीम और रामदेव का क्या सपना है ये तो वे ही जानें लेकिन इनमें मौलिकता नहीं है ये केवल विपक्ष की जगह लेना चाहते हैं जो कि काफी समय से रिक्त है। देश नई रचना चाहता है सत्ता में कौन आये विपक्ष में कौन आये इससे लोगों को कोई राहत मिलने वाली नहीं है।



गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

गीता को इनके समर्थन की जरूरत है?

          श्रीमद्भागवद गीता पर प्रतिबन्ध लगाने का मामला रूस की एक अदालत में चल रहा है। लेकिन इस प्रकरण को लेकर हमारे यहॉ कुछ राजनीतिक दलों और सरकार ने भी जितनी तत्परता दिखाई वह चौंकाने वाली है।सवाल उठता है कि भारतीय राजनीति में गीता को समझने वाले यदि इतने लोग हैं तो फिर देश की यह हालत क्यों होती जा रही है? जितने भी लोग गीता को लेकर चिंतित दिखने की कोशिश कर रहे है,ैं वास्तव में वे इस प्रकरण की ओट में राजनीति ही कर रहे हैं । इस विवाद को वे अपने लिए एक अवसर मानते हैं जिसे हाथ से जाने देना नहीं चाहते हैं, इससे अधिक इनको गीता से कुछ भी लेना देना नहीं है।रूस में गीता पर प्रतिबन्ध ,इनके लिए लोगों की भावनाओं से खेलने का एक नया मुद्दा भर है और सभी राजनीतिज्ञ इसका भरपूर दोहन करने के लिए सक्रिय हो गये है।  कोई भी धार्मिक ग्रंथ दुनिया में इसलिए प्रासंगिक नहीं है कि इनको कितने देशों, सरकारों ,राजनीतिक दलों अथवा दूसरे किस्म के प्रभावशाली लोगों का समर्थन मिला है।धार्मिक ग्रंथ इसलिए कायम है कि लोगों को इनकी जरूरत है।गीता ,कुरान और बाईबिल जैसे ग्रंथ पूरी मनुष्यता के ग्रंथ हैं ।इन पर किसी भी तरह का विवाद खडा करना या इन विवादियों के खिलाफ मोर्चा लेने की कोशिश करते हुए दिखना दोनों ही समान रूप से खतरनाक है। जो भी लोग धर्म की रक्षा करने का दावा करते हैं दरअसल वे खतरनाक किस्म के राजनीतिज्ञ ही हैं इसके अलावा वे कुछ नहीं है। धर्म का कोई ओर-छोर ही नहीं है तो फिर उसकी रक्षा करने का तरीका क्या हो सकता है ,धर्म को केवल जिया जा सकता है, या कहा जाना चाहिए कि धर्म में हुआ जा सकता है। जीसस ने धर्म की रक्षा के लिए इनकी तरह कोई प्रयास नहीं किया बल्कि कहा कि हे प्रभु इनको माफ करना क्योंकि से नहीं जानते कि वे क्या कर रहे है, यह धार्मिक वाक्य है ,लेकिन गीता प्रकरण को खतरनाक ढंग से हवा दी जा रही है।धर्म किसी से लडता नहीं और न ही उसकी ऐसी भाषा होती है, वह तो मनुष्य के अन्तस में प्रकाश जैसा फैलता ही जाता है किसी अन्धेरे से लडने की उसे कोई जरूरत ही नहीं । विज्ञान जिस तरह एक किस्म के अज्ञान को दूर करता है उसी तरह  धर्म का बोध हर किस्म के अज्ञान को मिटा देता है। गीता कुरान और बाईबिल जैसे ग्रंन्थ अलग-अलग रास्तांे से धर्म तक पहुॅचने के सूत्र देते है।जिससे व्यक्ति धर्म को महसूस कर सके, धार्मिक होना तो बहुत आगे की बात है, किसी को जबरन विवाद पैदा करना हो तो इसके लिए जरूरी है कि वह विवाद को ऐसे मुद्दे तक ले जाए जहॉ से इसके व्यापक होने की उम्मीद हो, शायद धर्म के नाम पर इतनी खुराफात इसी मकसद से की जाती है कि विवाद व्यापक स्तर तक फैल जाए। कोई माने या न माने धर्म ही व्यक्ति  का आधार जैसा है । लगभग वृक्ष की जडों जैसा ही, कुछ वृक्ष इस तथ्य को जान लेते होगें कि हमें खाद ,पानी और उर्जा समेट कर देने वाली हमारी जडें ही है, कुछ नहीं भी जानते होगें ,इसी तरह हमें अनन्त स्त्रोत से उर्जा देने वाला धर्म ही है चाहे हम इससे सहमत हों या न हों। लेकिन कुछ लोग धर्म को ”तेरा-मेरा˝ से अधिक कुछ समझ ही नहीं पाते है । जबकिें धर्म मनुष्य की चेतना की वह अवस्था है जहॉ  ”तेरा-मेरा˝ मिट जाता है, और राजनीति ”तेरा-मेरा˝ का ही दूसरा नाम है। इसलिए राजनीतिज्ञ यदि किसी धार्मिक  मामले में रूचि लेने लगें तो साफ है कि वहॉ विशुद्ध राजनीति ही है। राजनीतिज्ञ यदि धर्म को जरा भी समझ पाते तो देश की यह हालत नहीं होती।








बुधवार, 14 दिसंबर 2011

दिल बहलाने भर को ही अच्छा है ,लोकपाल का खयाल।





आखिरकार लोकपाल पर सहमति बनती नजर आ रही है ,इस मुद्दे पर अब केवल किन्तु-परन्तु ही बाकी रह गयी है ,सैद्धान्तिक रूप से सभी एकमत हैं कि जनप्रतिनिधियों के उपर लोकपाल की तत्काल जरूरत है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि जनप्रतिनिधियों पर अब लोगों का भरोसा नहीं रह गया है, इसलिए लोकपाल की निगरानी जरूरी है। जनप्रतिनिधियों में ईमानदारी कायम नहीं रह सकी तो वह लोकपाल में कैसे बनी रह सकेगी? यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है, यदि लोकपाल के हाथ में ही सत्ता को नियन्त्रित करने की ताकत हो जाएगी तो नेता खुद ही लोकपाल बनने को उत्सुक क्यों नहीं होगें?ं क्योंकि सारा खेल ही सत्ता और शक्ति के लिए है। जिनके हाथों में देश की सत्ता सौंपी गयी है उन पर ही लोगों को अविश्वास हो ,तो कहा जा सकता है कि लोकपाल पर विश्वास करने का कोई आधार नहीं है केवल सद्इच्छा है। फिर लोकपाल के उपर भी कोई और लोकपाल होना चाहिए और फिर उसके उपर कोई और ,यह प्रक्रिया कहॉ तक खींची जा सकती है इसका अनुमान लगाना कठिन है।यह चिंता का विषय तो है ,लेकिन इसे ठीक करने के नाम पर जो तरीके सुझाये और अपनाये जा रहे हैं ,जो उपाय किये जा रहे हैं वे खतरनाक है।
भ्रष्टाचार के आरोप न्यायाधीशों पर भी बहुतायत में लगने लगे हैं इन समस्या के समाधान के लिए न्यायपालिका जवाबदेही विधेयक की तैयारी चल रही है, यह मान लिया गया है कि न्यायाधीश भी अंसदिग्ध नहीं हैं । ऐसे में एक विधेयक से अदालतों पर लोगों का विश्वास बनाने की कोशिश करना इस बात की ओर इशारा करता है कि समस्या को ठीक से समझा ही नहीं जा रहा है । नेता,न्यायाधीश ,अधिवक्ता,चिकित्सक एक ढांचे में सही तरीके से काम कर सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि ये लोगों का भरोसा भी हासिल कर सकें। आज संकट भरोसे का है । कहने को तो जनप्रतिनिधि लोगों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं ,लेकिन लोग इन पर भरोसा नहीं कर पाते है। क्योंकि ये लोग वास्तव में राजनीतिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करते हैं जनता का नहीं,। इनका नजरिया और प्राथमिकतायें कहीं से भी लोगों से मेल नहीं खाता है। आज पूरी निर्वाचन प्रक्रिया पर राजनीतिज्ञों का नियन्त्रण है। ये लोग इस खेल के इतने महारथी हो गये है कि वे अपराधियों तक को जनप्रतिनिधि का तमगा लगाकर संसद में पहुॅचा देते है।इनको लोगों से निर्वाचित करवा लेते हैं, यही इनका खेल है। और यही लोगों के इन पर अविश्वास का भी कारण है। चुनावी मैदान में इन दलों की हैसियत अब कॉरपोरेट घरानों जैसी हो गयी है ,छात्र संघ के चुनावों से लेकर ग्राम सभा, लोकसभा और राज्य सभा में कौन चुना जाए कौन नहीं इस पर राजनीतिक दलों की मनमानी है और लगभग एकाधिकार जैसा है। जनता चाहे किसी को भी वोट दे नतीजा कमोवेश वही निकलेगा जैसा कि राजनीतिज्ञ चाहते है। इसी कारण लोग इन पर भरोसा ही नहीं करते बल्कि अविश्वास भी करते है, और यदा-कदा नफरत भी प्रगट करते हैं। इतना तय है कि जनप्रतिनिधियों पर अविश्वास अब व्यक्तिगत सोच या नजरिया नहीं रह गया है। यह अब सामाजिक और राजनीतिक रूप से स्वीकृत मान्यता है, कि इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। कहना न होगा कि लोकपाल का यह भरम थोडे ही दिन चल पायेगा क्योंकि यह तर्क अभी और आगे जाऐगा कि लोकपाल के उपर भी कोई नियन्त्रण होना चाहिए । यह बात बढती ही जाएगी और हर बार समस्या विकराल होती ही जाएगी। इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह नहीं हो सकता है कि लोकपाल उन सब विकारों से मुक्त रहेगें जिनसे हमारी सभी लोकतांत्रिक संस्थायें ग्रस्त हैं और अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही हैं । कहा जाता है कि सीजर की पत्नी पर सन्देह से परे होती है। लेकिन हमारे यहॉ कोई भी ऐसा नहीं है जो सन्देह से परे हो अविश्वास के इस माहौल में नई लोकपाल व्यवस्था कैसे लोगों का विश्वास लौटा पायेगी, कहना कठिन है।


शनिवार, 10 दिसंबर 2011

लोकपाल, भ्रष्टाचार मिटा देगें?

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत बनाने में अन्ना की पहल को कम करके नहीं आंका जा सकता है। अन्ना ने इस समस्या को पूरी गम्भीरता से उठाया, और लोगों ने इस आंदोलन को अपना भरपूर सहयोग और समर्थन भी दिया ,लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ असंतोष को जिस तरह लोकपाल पर ही केन्द्रित किया जा रहा है ,उससे लगता है कि भ्रष्टाचार और उससे जुडे सभी सवाल अब पीछे छूटते जा रहे हैं तथा लोकपाल विधेयक अब सरकार और अन्ना के बीच जोर आजमाईस का मुद्दा बनता जा रहा है। यह सवाल पूछा जाने लगा है कि आंदोलन के नाम पर सरकार को नियन्त्रित करते हुए दिखना कहॉ तक ठीक है? सरकार आंदोलनकारियों की तरह नहीं सोच सकती है यह उसकी सीमा है और आंदोलनकारी सरकार की तरह नहीं सोच सकते है यह इनकी व्यापकता है। इसी कारण भ्रष्टाचार से निबटने के लिए एक जैसी समझ विकसित करना नामुमकिन है। सरकार जो चाहे वह करे, उसे नियन्त्रित करने का प्रयास दूसरी समस्याओं का कारण बन सकता है। अन्यथा यह पूरा आंदोलन तू तू-मैं मैं तक ही सीमित हो जाएगा, कभी केजरीवाल और किरण बेदी खुद ही भ्रष्टाचारी साबित हो जाते हैं और प्रतिक्रिया में केजरीवाल ,हिसार में कांग्रेस को हराने का बीडा उठा लेते है। यह स्पष्ट रूप से आंदोलन में गिरावट का संकेत है। आंदोलन से यह अपेक्षा है कि वह लोगों के सामने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे । भ्र्रष्टाचार के प्रति आंदोलनकारियों की समझ क्या है, इसे व्यक्तिगत दुर्गुण माना जाए या फिर यह विकार ,व्यवस्था में ही निहित है। जो भ्रष्टाचारी पकड में आ जाए उसको ही दण्डित करके संतुष्ट हो लिया जाए या फिर लोग भ्रष्टाचार मुक्त समाज और राजनीति का ऐसा कोई मॉडल लोगों के समक्ष रख जाए जिसमें लोग भ्रष्टाचार के प्रति उत्सुक ही न हों।ऐसे ही तमाम सवालों से गुजर कर ही यह आंदोलन परिपक्व हो सकेगा, इनसे बचकर नहीं। लोकपाल के ताकतवर होने से भ्रष्टाचार के समाप्त होने का कोई भी सम्बन्ध नहीं हैं। क्योंकि भ्रष्टाचार बहुत से लोगों के दिल ,दिमाग में ही नहीं आत्मा तक में पसर गया है,विशेषकर प्रभावशाली वर्ग में। ऐसे में लोकपाल गठन का केवल तात्कालिक महत्व है, यह कोई स्थाई समाधान नहीं है।एक बडे जनआंदोलन की सम्भावना को सशक्त लोकपाल की मांग तक ही सीमित करने के बहुत नुकसानदेह परिणाम होगें।यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या सशक्त लोकपाल के बिना नेता ईमानदार नहीं हो सकते हैं? दरअसल इस सशक्त लोकपाल की पूरी अवधारणा एक काल्पनिक ताकतवर दरोगा जैसी ही है, लगभग दबंग जैसी ही। नेताओं को लोकपाल से नियन्त्रित करने की कोशिश, अन्ततः इनके बीच आपसी समझदारी विकसित कर देगी ,केवल इतने से ही इस पूरे आंदोलन पर पानी फिर सकता है।

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

samay: रूठने और मनाने के मायने ?

samay: रूठने और मनाने के मायने ?: एफ0डी0आई के मुद्दे पर प्रणव मुखर्जी जिस तरह ममता को मनाने में लगे हैं वह स्तब्ध कर देने वाला हैं राष्ट्र की नीतियां तय करने के लिए...

रूठने और मनाने के मायने ?





एफ0डी0आई के मुद्दे पर प्रणव मुखर्जी जिस तरह ममता को मनाने में लगे हैं वह स्तब्ध कर देने वाला हैं राष्ट्र की नीतियां तय करने के लिए मान-मनुहार निर्णायक होने जा रही हो हो तो अनुमान भी लगाना कठिन है कि क्या होने वाला है। कहा जाता है कि अभी कुछ समय पहले अमेरिका से परमाणु सहयोग के मुद्दे पर सरकार का समर्थन करने के लिए सांसदों का पक्ष खरीदा गया था।  और यह प्रस्ताव पारित करा लिया गया । नोट फॉर वोट के नाम से यह मुद्दा अब भी अदालत में विचाराधीन है, फैसला अब कुछ भी हो लेकिन अब यह लागू हो चुका है।आज यदि ”किसी तरह“ ममता जी को मना भी लिया जाए और एफ0डी0आई0 का प्रस्ताव सरकार पारित भी करवा ले तो उसकी विश्वसनीयता ही कितनी होगी? भारतीय राजनीति में आम सहमति का महत्व नकारात्मक होता जा रहा है। इस कथित आम सहमति के बदले में अयोग्य लोगों ने महत्वपूर्ण पद हथियाये हैं,यह किसी से छुपा नहीं है। कहा तो यहॉ तक जाने लगा है कि सी0बी0आई0 के प्रकोप से बचने के लिए भी सरकार के धुर विरोधी अन्तिम समय में उसके समर्थन में खडे होते रहे हैं, तथा उन्हीं नीतियों का समर्थन करने लगते हैं जिसका वे विरोध करते रहे। ऐसे में जनप्रतिनिधि की निष्ठा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है यह शायद ही किसी ने सोचा होगा कि  जनप्रतिनिधि इतने कमजोर व्यक्तित्व का भी हो सकता है कि वह अपनी निष्ठा को लेकर बाजार में खडा हो जाए । ममता जी की एफ0डी0आई के मुद्दे असहमति हो ,ऐसा सम्भव ही नहीं है, दरअसल यह फैसला तो सरकार की नीतियों का ही एक चरण है।ऐसे में या तो ममता जी को सरकारी नीतियों का ही विरोध करना चाहिए या फिर इन नीतियों का समर्थन । जिन नीतियों से पूरी सहमति है उस पर ही आधारित फैसलों का विरोध कैसे किया जा सकता है?। ममता जी ही नहीं पूरा विपक्ष सरकार की नीतियों का समर्थन और फैसलों का विरोध करता है। यह विरोधाभाष लोगों के साथ धोखाधडी है।सरकार की नीतियों का समर्थन करने के अलावा आज विपक्ष के पास और कोई चारा भी नहीं है क्योंकि इनके पास वैकल्पिक और समानान्तर नीतियां नहीं हैं ।धारा 370 ,राम मन्दिर, आरक्षण ,जल विवाद महिला आरक्षण जैसे कुछऐक सामाजिक मुद्दों के अलावा कोई भी भिन्न आर्थिक नीति नहीं है।यह देश का भी दुर्भाग्य है कि विपक्ष वही है जिसको सत्ता में भागीदारी नहीं मिल पायी है। अन्यथा सब एक ही मार्ग के पथिक हैं। इनके पास दूसरा कोई पक्ष ही नहीं हैं इसलिए विपक्ष की ताकत केवल नुक्ताचीनी में ही चुक जाती है। एफ0डी0आई को ही लें यह किसी के मानने या मनाने का प्रश्न नहीं है।और न ही इस पर निर्भर होना चाहिए, इसके औचित्य या इसके विकल्प पर ही बात होनी चाहिए यह दो दलों अथवा लोगों के बीच का भी मुद्दा नहीं है। सारी बातें लोगों बीच भीे स्पष्ट होनी चाहिए। संसद में बहुमत की आंकडेबाजी अब निर्विवाद नहीं रही है यह संदेह के घेरे में है। संसद के प्रति लोगों के मन में सम्मान का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि लोग मान-मनुहार और रूठने मनाने का खेल खेलते रहें और पूरा देश देखता रहे, सांसद, संसद का पर्यायवाची भी नहीं है, वह संसद का एक सदस्य है यदि अपने हित को ध्यान में रखते हुए देश को प्रभावित करने वाली नीतियों का समर्थन अथवा विरोध करता है तो यह गलत है।  ममता जी अथवा प्रणव मुखर्जी को मानने और मनाने का क्रम बन्द करना चाहिए।एफ0डी0आई गलत है या सही स्पष्ट रूप से अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार जाए अथवा रहे ,सरकारें देश से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं इससे तो कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है।



शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

samay: एफ0डी0आर0 पर नाटक!

samay: एफ0डी0आर0 पर नाटक!: खुदरा क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के सीधे और एकाधिकारी प्रवेश की अनुमति के खिलाफ पूरे विपक्ष ने विरोध स्वरूप देश व्यापी हडताल का भी आयोजन क...

एफ0डी0आर0 पर नाटक!

खुदरा क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के सीधे और एकाधिकारी प्रवेश की अनुमति के खिलाफ पूरे विपक्ष ने विरोध स्वरूप देश व्यापी हडताल का भी आयोजन किया, हालांकि विपक्ष इस तथ्य से पूरी तरह परिचित है कि एफ0डी0आर0 आज की परिस्थिति में इस देश का प्रारब्ध बना दिया गया है। इस प्रारब्ध को बदलने की सामर्थय और थोडी सी इच्छा इस विपक्ष में नहीं है,वास्तविक विरोध करना विपक्ष का  मकसद भी नहीं है रस्मी विरोध को इनके द्वारा केवल आडम्बरपूर्ण बनाया जा रहा है। सरकार की नीति जनविरोधि ही सही  लेकिन इसमें रचनात्मकता है सरकार के अपने तर्क हैं और तर्को के लिए अपने को दॉव में लगाने का संकल्प भी है। लेकिन विपक्ष विरोध करने के काबिल भी नहीं रह गया है वही पुराना बाजार बन्द का आह्वाहन और संसद की कार्यवाही का बहिष्कार ,कहीं से भी नहीं लगता है कि देश के प्रति जिम्मेदारी का जरा भी एहसास विपक्ष को होगा।सरकार ने जो कुछ करना है वह खुलेआम कर रही है लेकिन विपक्ष जो कुछ कर रहा है उसकी कथनी और करनी में अन्तर ही नहीं बल्कि यह लोगों के साथ खुलेआम धोखाधडी है। इनका विरोध पूर्णतः दिखावटी और मैच फिक्सिंग जैसा है।सरकार ने पूरे विपक्ष को चुनौती दी है कि वह एफ0डी0आर0 से होने वाले नुकसान को बताए लेकिन विपक्ष के पास कोई जवाब नहीं है।वास्तव में एफ0डी0आर0 अब कोई मुद्दा बन भी नहीं सकता है क्योंकि सुई के छेद से पूरा हाथी निकल चुका है केवल पूॅछ बची है इस पूॅछ को लेकर हायतौबा मचाने का अब कोई औचित्य भी नहीं है। देश मे लागू की जाने वाली नीतियां कोई भोजन का थाल नहीं है कि जो आपको पसंद न हो उसे छोड दें और जो आपको स्वादिष्ट लगे उसे ही खायें, या तो पूरा थाल खाना होगा या फिर पूरा ही छोडना होगा ।यह दुखद है लेकिन निश्चित है कि एफ0डी0आर0 का विरोध देर सवेर उसी तरह दम तोड देगा जैसे कि स्वदेशी आंदोलन ने दम तोड दिया। यह देश सरकार के कारण बरबाद होगा या नहीं यह कहना कठिन है लेकिन विपक्ष ,इसकी बरबादी का कारण निश्चित ही बनने जा रहा है।


मंगलवार, 29 नवंबर 2011

एक पंख से उडता विरोध का पंछी।

विदेशी कम्पनियों के लिए खुदरा क्षेत्र में पूरे दरवाजे खोलने और इसका विरोध करने पर अब बहस तेज हो गयी है, हांलाकि यह कोई नई घटना नहीं है यह तो केवल उस नीति का ही परिणाम है जो कि हमारे यहॉ 1991 से ही नई आर्थिक नीतियों के नाम से लागू हैं। जानकार लोगों का कहना है कि यह विरोध भी केवल विपक्ष की औपचारिकता निभाने जैसा ही है इसमें गम्भीरता कुछ भी नहीं है, यही विपक्ष यदि आज सत्ता में होता तो वह भी खुदरा क्षेत्र में इसी तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति को लागू करता ,जो नीति अब  खुदरा क्षेत्र में दिखाई दे रही है , सार्वजनिक क्षेत्र से लेकर, कृषि और सरकारी क्षेत्र की नौकरियों में यह नीति पूरी निर्ममता से पहले ही लागू की जा चुकी है ,तथा कांग्रेस और भाजपा दोनों ने एक समान समर्पण और निष्ठा से इस नीति के पक्ष में काम किया है इसमें कोई शक नहीं है। सभी जानते हैं कि हमारे खुदरा व्यापारियों के लिए  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुकाबले टिके रहना किसी भी तरह सम्भव नहीं है, इसलिए यह तय है कि छोटे स्तर के व्यापारियों को इन नीतियों के कारण अब सडकों पर आना ही होगा। लेकिन जिस तरीके से इस नीति का विरोध किया जा रहा है,उसमें कुछ भी नया नहीं है। विरोध का कोई सार्थक तर्क भी नहीं है ,बिचौलिए किसानों के उत्पाद की कीमतें मनमाने तरीके से जिस तरह तय करते हैं और उपभोक्ताओं को महंगें दामों पर बेचते हैं उसका बचाव नहीं किया जा सकता है। यही बात सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भी सरकार ने कही जाती थी ,कि निजि क्षेत्र की तकनीक और कार्यसक्षम सेवायें सरकारी कर्मचारियों से बेहतर होंगी इसी के आधार पर सरकारी नौकरियों में रोक लगा दी गयी थी। हांलाकि आज भयानकतम होती जा रही बेरोजगारी इसी नीति का परिणाम है लेकिन भ्रष्ट,आलसी और पिछडीे तकनीक से काम करने वाले आरोपों में भी दम था। आज बेरोजगारी के कारण न सिर्फ बडी आबादी बल्कि पूरी बाजार व्यवस्था पर ही गम्भीर संकट आ गया है तब भी इस तथ्य को नजरअंदाज किया गया। आज यही खुदरा क्षेत्र में भी होने जा रहा है, इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है।
      विदेशी कम्पनियांहमारे यहॉ खुदरा क्षेत्र के व्यापार में चल रही खुली लूट को लेकर चिंतित नहीं हैं, और ना ही वे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए यहॉ आने को जोड तो कर रही हैं, दरअसल वे इस लूट में हिस्सेदारी स ेअब संतुष्ट नहीं है बल्कि पूरी लूट खुद ही करना चाहती है।  इसलिए इस नीति का विरोध करने या समर्थन करने का हमारे सामने कोई विकल्प नहीं है। इसके विरोध का मतलब यह है कि स्वदेशी के नाम पर देशी लुटेरों का साथ दिया जाए या फिर स्पष्ट विदेशी हस्तक्षेप को पहले रोका जाए। दोनों ही बातों को एक साथ तय करने का अब सही समय आ गया है। इसके लिए किसानों को सहकारिता के आधार पर समिती बनाकर बाजार में सीधे प्रवेश का ढांचा उपलब्ध कराना एक उचित विकल्प है।ऐसे ही और भी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। जबकि विपक्षी दलों का यह आंदोलन किसी विकल्प पर बात नहीं करना चाहता है। इसी से इस आंदोलन की ईमानदारी पर सवाल उठता है। लोगों से संवाद किये बगैर ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आंदोलन का हश्र एक पंख से उडने की कल्पना करने वालों जैसा ही होगा। 





रविवार, 30 अक्तूबर 2011

उडनपरी को मंत्री का साथ !

              मंत्रियों के बयानों को लेकर लोगों में अक्सर उदासीनता का भाव रहता है।कम से कम यह उम्मीद करना तो बहुत ही कठिन हो जाता है कि कोई मंत्री आम लोगों की भावना को व्यक्त करें,दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा में फार्मूला-1 कार रेस आयोजन पर केन्द्रीय खेल मंत्री अजय माकन ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी है। वह ध्यान देने योग्य है ही, साथ ही उनके नजरिए से  सुखद आश्चर्य के साथ-साथ थोडा सकून भी मिलता हैं ।हमारे देश की अन्तर्राष्ट्रीय ,ख्यातिनाम धाविका पी0टी0 उषा ने ग्रेटर नोएडा में फार्मूला-1 कार रेस आयोजन को खेल आयोजन कहे जाने पर महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं साथ ही इसके प्रति अपनी नाराजगी भी व्यक्त की है।  लेकिन घॅुआधार प्रचार ,ग्लैमर,तडक-भडक और शोर-शराबे में लग रहा था कि उषा के सवालों को रौंद दिया जाएगा लेकिन ठीक इसी वक्त पर खेलमंत्री पी0टी0 उषा की खेल अकादमी की अधारशिला रखने पहुॅचे हैं बल्कि उन्होनें इस आयोजन के स्तर के अनुरूप शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपनी राय भी रखी है। इससे पहले ही खेल मंत्री इस आयोजन को 600 करोड रू0 की कर रियायत देने की याचना को ठुकरा चुके थे। हमारी उडनपरी ने इस आयोजन पर कोई सवाल नहीं उठाये है बल्कि उन्होने पूछा है कि धंधे को खेल कैसे कहा जा रहा है? विदेशी मोटर कम्पनियां अपने देश की तकनीक का प्रदर्शन कुछ पेशेवर वाहन चालकों के मार्फत कर रही हैं लगभग उसी तरह जैसे कि एयर शो होते हैं अथवा रेस कोर्स में दौड होती हैं। ये सब या तो प्रदर्शन हैं,या फिर इसमें दॉव लगाये जाते हैं,या इनमें विज्ञाापन के स्टीकर लगाये जाते हैं। ये खेल तो कहीं से कहीं तक नहीं हैं। कुछ लोग जुए को भी खेल कह सकते हैं लेकिन जुआ सिर्फ जुआ है वह खेल हो ही नहीं सकता है। टी0-20 क्रिकेट पर भी पी0टी0 उषा ने सवाल उठाये हैं, टी0-20 क्रिकेट ही नहीं बल्कि क्रिकेट के किसी भी प्रारूप में शुद्धतम खेल नहीं है। इसमें खिलाडियों से अधिक खेल पिचों का होता है,नई गेंद और पुरानी गेंद भी अपना खेल खेलती ही हैं  और टॉस भी अक्सर निर्णायक हो जाते हैं ऐसे में खिलाडियों के लिए खेलने की बहुत ही कम गुंजाइस बच पाती है। क्रिकेट के अतिरिक्त शायद ही कोई खेल ऐसा होगा जिसमें पिच,गेंद और टॉस का इतना गहरा असर होता है। क्रिकेट में खिलाडियों को खेलने की गुंजाइस इतनी नहीं होती है कि इसे भी शुद्धतम खेल कहा जा सके।
फिलहाल उडनपरी का खेलों की हिफाजत के लिए आगे आना खेल जगत में नई उषा का आगमन जैसा है। लेकिन अजय माकन का पी0टी0 उषा के साथ खडे होना अब तक तो अविश्वसनीय ही लग रहा था, लेकिन चिगूॅटी काटने के बाद ही पता चला कि यह स्वप्न नहीं बल्कि फिलहाल तो सच्चाई है।चाहे सच्चाई कितने ही कम दिन के लिए हो लेकिन सच्चाई का होना सुखद तो है ही।



शनिवार, 10 सितंबर 2011

ईराक और अफगानिस्तान में 9/11 हर रोज होते हैं।

                          9/11 की घटना को दस वर्ष पूरे होने पर एक सवाल लगभग सभी के दिमाग में है कि इन दस वर्षों में 9/11 के कारण दुनियां कितनी बदली है। इसके बारे  में लोगों की अलग-अलग राय हैं, लेकिन एक तथ्य से शायद ही कोई असहमत होगें कि बेगुनाहों का मरना अब भी उसी तरह जारी है जैसे कि 9/11 से पहले था।फर्क इतना ही पडा है कि पहले इन्हीं आतंकवादियों को अमेरिका का समर्थन और सहयोग था अब अमेरिका ही इनके खिलाफ हो गया है। आतंकवादियों को पाकिस्तान के जरिए  जैसा खुला समर्थन अमेरिका ने दिया था वह किसी से छुपा नहीं है। कम से कम भारत के सम्बन्ध में तो यह कहा जा सकता है कि चाहे पंजाब का आतंकवाद हो या कश्मीर का आतंकवाद यह अमेरिकी मदद के बिना कर पाना तो दूर, पाकिस्तान के लिए सोचना भी असम्भव था। भोपाल गैस कांड के आरोपी एंडरसन को रातों-रात भारत से निकालने का काम हो या पाकिस्तान में एक अमेरिकी ऐजेंट द्वारा दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या के आरोपी को वहॉ से निकालने का काम हो अमेरिका के लिए आतंकवाद की अपनी परिभाषा है, उसके अपने फैसले हैं, और दुनियां भर में वह इनको पहले भी लागू करता था और आज भी कर ही रहा है।दुनियां भर की पिछलग्गू सरकारें केवल इनकी हॉ में हॉ मिलाने का काम करती है।
                      आतंकवाद की अमेरिकी परिभाषा के साथ अपने को जोड लेना अमेरिकी आतंकवाद के साथ होने जैसा है। 9/11 के बाद अमेरिकी नीति में जो फर्क आया है उस पर ध्यान देना जरूरी है। पहले अमेरिका दुनियां भर के तानाशाहों और अमेरिका परस्त शासकों के दम पर अपनी राजनीति करता था लेकिन 9/11 के बाद उसे खुलकर सामने आना पडा है। क्योंकि बात अब उस तक ही आ चुकी थी । जब खुद के पाले हुए आतंकवादी ही पीछे पड गये हों तो ख्,ाुलेआम बमबारी करना अमेरिका की मजबूरी हो गयी है। यह काम वह अब किसी के द्वारा करवा नहीं सकता है इसलिए खुद ही उसे सामने आना पडा है। यह कोई आतंकवाद के खिलाफ ईमानदार लडाई नहीं कही जा सकती है। यह केवल अमेरिका का अपने एजेटों को संदेश है कि यदि सीमा का उल्लघंन किया तो नेस्तनाबूत कर दिये जाओगे।
                  9/11 की घटना अमेरिकी राजनीति,कूटनीति और सैन्य समीकरणों के लिहाज से उनके लिए निर्णायक मोड हो सकता है लेकिन दुनियां में फैल चुके इस आतंकवाद के पीछे अमेरिका ही मुख्य कारण है इसे कौन नकार सकेगा? मुम्बई और दिल्ली समेत हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद के कारण जो कीमत हमने चुकाई है वह 9/11 से किसी भी मामले में कम नहीं है। 9/11 खुद अमेरिकी नीति के लिए सबक हो सकता है । यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आतंकवादियों के पास हथियार और पैसा कहॉ से आता है इनके पीछे  अलग-अलग देशों की सरकारों के हित और उनके भविष्य की योजनायें है। जब तक यह खेल खत्म नहीं होता है तब तक आतंकवाद के खिलाफ आतंकवाद तो चलाया जा सकता है जिस तरह  ईराक ,अफगानिस्तान और कमोवेश पाकिस्तान में बमबारी करके चलाया जा रहा है। यह 9/11 जैसी ही क्रूरतम आतंकवादी कार्यवाही है। इससे किसी भी मामले में जरा भी कम नहीं है। 9/11 के बाद आतंकवाद पर अमेरिकी प्रतिक्रिया का दौर शुरू हो चुका है, आतंकवाद जारी है ,पहले अमेरिका अपने ऐजेन्टों के जरिए यह काम करवाता था और इन्हें मुजाहिदीन कहता था, अब इनको कुचलने के नाम पर बेगुनाहों पर बमबारी की जा रही है 9/11 के नाम पर जिस देश को चाहे वह रौंदता ही चला जा रहा है,





गुरुवार, 1 सितंबर 2011

बडे सवालों को छोटा कर रहे हैं राजनीतिज्ञ !

navaljoshi11yahoocoin.blogspot.com
                 तमिलनाडु विधान सभा में उन अभियुक्तों को क्षमादान देने का प्रस्ताव पारित किया गया है, जिन्हें राजीव हत्याकाण्ड से सम्बन्धित होने के कारण फॉसी की सजा सुनाई गयी है।फॉसी की सजा बहुत विवादास्पद है। इसके पक्ष और विपक्ष में अनेकों दलीलंे दी जाती हैं।यह उम्मीद बढती जा रही है कि निकट भविष्य में राज्य द्वारा सार्वजनिक रूप से न्याय के नाम पर किसी इंसान की हत्या करना मुश्किल होता जाएगा। दुनियां के 120 से अधिक देशों में जिस तरह इंसाफ के नाम पर इंसानी हत्या पर रोक लग चुकी है, उम्मीद की जाती है कि हमारे देश में यह जल्द ही लागू हो जाएगा। फिलहाल कुछ लोगों ने इसे बडा सवाल बना दिया है जबकि  इसे तुरन्त लागू किये जाने की जरूरत है। लेकिन इतने बडे सवालों को यदि गलत तरीके से उठाया  जाता रहा जैसा कि तमिलनाडु में हो रहा है तो नरबलियों के इस खेल को रोका जाना कठिन होता जाएगा, और यह चलता ही जाएगा। तमिलनाडु विधानसभा मंच का इस्तेमाल जिन लोगों ने अपनी राजनीति के लिए किया उससे जाहिर होता है कि इनकी समझ कितनी सतही और खतरनाक भी है। न्याय यदि किसी भी राज्य ,समुदाय,वर्ग,धर्म या समूहों की भावनाओं के आधार पर प्रभावित होने लगे तो वह न्याय कहॉ रह जाएगा ? जबकि यह मुद्दा  महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि सर्वोच्च प्राथमिकता का है कि कितना ही खतरनाक अपराधी हो उसे मारकर समाज को क्या मिलता है? हमारे छोटे-छोटे बच्चे यह नहीं समझ पाते हैं कि  अपराध और न्याय क्सा है ?लेकिन हमारी न्याय ,कानून व्यवस्था और राज्य सभी मिलकर बच्वों को यह दिखा रहे हैं कि इंसान को कानूनी तरीके से मारा भी जा सकता है।  हम कानूनी तरीके से लोगों को मारते हैं और आतंकवादी गैरकानूनी तरीके से लोगों को मारते हैं। इंसान को मारने में दोनों ही पक्षों की बडी दिलचस्पी है।यदि कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी हो तो न्याय की बेदी पर इंसान के सिर काट कर चढाये जा सकते हैं लेकिन इससे न्याय को किस तरह की संतुष्टि मिलती है यह कहना कठिन है ।जब कोई इंसान महान काम करता है तो  हम किसी भी तरह से उसका श्रेय लेने को दौड पडते है,चाहे उससे हमारा कुछ भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लेना-देना हो या न होे। लेकिन कोई व्यक्ति यदि  परिस्थितिवश पतित हो गया तो हम उसकी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं बल्कि जितनी जल्दी हो सके उसकी जान लेने को उतारू हो जाते हैं। जबकि जान लेने के आरोप पर ही हम भी  उसकी जान ही लेते है।
              उमर अब्दुल्लाह ने जो सवाल उठाया है वह लोगों के दोगलेपन पर सीधी चोट है। लेकिन उन्होने हमारी समाजिक सोच और न्याय के नाम पर हमारी क्रूर मानसिकता को यदि विषय बनाया होता तो इसके जल्द ही सकारात्मक परिणाम आते लेकिन यह बात भी उन्होंने  प्रतिक्रिया में कही जिससे कि एक बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाकर भटकाया जा सकता है। चाहे जिस भी मंशा से यह सवाल उठाया हो लेकिन इस सवाल को लोग सही नजरिये से समझने की कोशिश करेंगें तो कम से कम हमारे देश में इंसानी बूचरखाने तो बंद ही हो जाएगें हमारे लिए यह महान उपलब्धि होगी।


मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मौत से सजा का क्या तालमेल।

तीन अभियुक्तों को दी जाने वाली फॉसी की सजा पर मद्रास हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। बीच-बीच में फॉसी की सजा का प्रश्न उठता रहता है। लेकिन सवाल यह है कि फॉसी की सजा के नाम पर क्या किसी की भी वैधानिक तरीके से हत्या करना ठीक है ? हत्या अभियुक्त ने भी की है और प्रतिक्रिया में हत्या हम भी कर रहे हैं दोनों के बीच अन्तर क्या है ? क्या केवल कानूनी और गैर कानूनी का ही अन्तर है । मूल कृत्य हत्या है जिस पर दोनों ही पक्षों का समान विश्वास है। सवाल यह है कि हम अपराधी को सजा दे रहे हैं या उससे बदला ले रहे हैं, किसी को भी सजा देने का मतलब यह है कि अभियुक्त उस पीडा से खुद गुजर कर महसूस करे कि उसने जो किया वह ठीक नहीं था। भोगने की दशा में यह प्रक्रिया पूर्ण भी हो सकती है यह प्रबुद्ध लोगों के निष्कर्ष भी हैं। इस प्रक्रिया को ही सजा कहा जाता है। इसके लिए यह जरूरी है कि अभियुक्त को जीवित भी रहना होगा तभी यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।फॉसी को सजा कहना गलत है,मौत की कोई सजा हो ही नहीं सकती है मौत देने का मतलब है कि आप बदला ले रहे हैं। यदि ऐसा है तो इसे खुले रूप में कहा जाना चाहिए कि हत्यारे से बदला लिया जा रहा है यह हत्या के बदले हत्या  है। सजा की पूरी सोच और मनोविज्ञान का फॉसी से कोई तालमेल नही बैठ सकता है।
          बहुत से लोग समय-समय पर फॉसी देने की मांग उठाते रहते हैं। यह विचार करने योग्य विषय है कि कहीं अवचेतन में इंसान को मारने, मारने में भागीदार होने या इंसान को मरता देखने की विकृति इस मांग के पीछे तो काम नहीं कर रही है। ऐसे ही लोग दंगों की आड में लोगों की हत्यायें कर अपनी विकृति को तुष्ट कर लेते है। नरबलि की प्रथा भी शायद ऐसे ही लोगों की उपज थी इसके लिए देवताओं की बेदी को बहाना बनाया गया और आज न्याय के नाम पर फॉसी की वकालत की जा रही है। न्याय कानून और सजा ,इंसान से सम्बन्धित हैं इंसान को मारने का कोई भी तर्क हो ही नहीं सकता है। यह केवल विकृति है। कोई एक व्यक्ति शायद इंसानी गरिमा का पालन न भी कर सके लेकिन यह राज्य का कर्तव्य है कि इंसानी गरिमा को चोट न पहॅुचे यह सुनिश्चित किया जाए। नरभक्षी जानवरों तक को पकडकर नहीं मारा जाता है फिर इंसान को मारने की इच्छा जाग्रत क्यों होती है यह मनोरोग है और कुछ नहीं, हमें अपने मन में भी झांककर देखना होगा । अपराधी ने अपनी समझ के हिसाब और हमारी सुरक्षा चूक का फायदा उठाकर कुकृत्य किया बदले में हम भी अपराधी मानसिकता के लोगों जैसा व्यवहार करने लगें यह ठीक नहीं हैं।  बहस चलती रहनी चाहिए और तब तक इन वैधानिक हत्याओं पर भी रोक लगी रहे सवाल यह नहीं है कि हत्यारे के साथ कैसा व्यवहार किया जाए सवाल यह है कि हम कैसे हैं?



सोमवार, 29 अगस्त 2011

भ्रष्टाचार कोई चोर नहीं है कि लोकपाल से डर जाएगा।

अन्ना आंदोलन को कुछ लोग जीत हार के आईने में देखने की कोशिश कर रहे है। ,लेकिन इससे यह लगता है कि इस आंदोलन ने किसी को हराया भी है। जबकि  आंदोलन यदि सुखान्त तक पहुॅचा  तो इसका थोडा बहुत श्रेय आंदोलन के प्रतिपक्ष को भी जाता है।  संसद ने अन्त में  परम्पराओं से  हटकर इस खतरे के बावजूद आंदोलन को एकमत से अपना समर्थन दिया कि ऐसा करने से परम्परावादियों और यथास्थितिवादियों के बीच यह संदेश जा सकता है कि सरकार ने घुटने टेक रही है ,जैसा कि स्वामी अग्निवेश की वीडियो से जाहिर भी हो रहा है।  हिचकिचाहट के बाद ही सही संसद ने आंदोलन के पक्ष में संाकेतिक रूप से प्रस्ताव पारित किया तो इस योगदान का भी महत्व है। अन्यथा सत्ता मद में चूर लोगों का कोई भी गलत निर्णय भयानक तबाही का कारण बन सकता था, ऐसी स्थिति को टाला गया   इससे संसद पर लोगों के क्षरित होते जा रहे विश्वास में थोडा सा विराम भी लगा है। लोगों को संसद से कोई नाराजगी नहीं है, नाराजगी इस बात से है कि बेईमान ,भ्रष्ट और अपराधी मानसिकता के लोग संसद पर हावी होते जा रहे हैं यदि इस अर्न्तद्वन्द में संसद के भीतर  सकारात्मक सोच वाले लोगों की जीत हुई है तो इसका भी अपना महत्व है इसके बिना आंदोलन की सफलता  थोडी और दूर जा सकती थी। विनम्र आंदोलनों का यह भी गुण होता है कि वे किसी के भी छोटे से छोटे योगदान को भूलते नहीं है।
     इस आंदोलन से लोग अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं और अपने-अपने तरीके से  और इसका विष्लेषण करेंगें लेकिन इतना तय है कि इस सफलता के बावजूद भ्रष्टाचार को रोकना फिलहाल सम्भव नहीं है, क्योंकि यह मानसिकता क्या है और क्यों फैल रही है ?जब तक यह स्पष्ट नहीं किया जाता है तब तक कोई भी उपचार कारगर नहीं हो सकता है।भ्रष्टाचार कोई कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है कि आपने लोकपाल के रूप में एक पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति कर दी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया।  भ्रष्टाचार का मतलब भ्रष्ट लोगों के आचरण से है। यह आचरण केवल पैसों की लूट और घोटालों तक ही सीमित नहीं है, भ्रष्ट मानसिकता कैसे कदम-कदम पर लोगों को अपमानित भी करती है, इसे कोई भी लोकपाल पकड नहीं सकते हैं। भ्रष्ट लोग जब तक रहेगें तब तक उनके आचरण का दंश लोगों को आहत करता ही रहेगा।  भ्रष्ट लोगों के आचरण को रोकना असम्भव है ,भ्रष्ट लोगों को ही हतोत्साहित करना होगा और रोकना होगा ताकि वे चुनाव के जरिए राजनीति में न आ सके, मंदिर मस्जिदों के पुरोहित न बन जाए,डाक्टर, अध्यापक पुलिस और न्यायपालिका जैसा पेशे में न आ सकें। आज हालत यह है कि जिसको भी पैसा कमाने की चाहत है और लोगों को दुखी करने में आनन्दित होने की बीमारी है वह किसी भी तरह से राजनीति में आ जाता है, जिनकी हिम्मत इससे थोडा कम है वे डाक्टर, अध्यापक  पुलिस और न्यायपालिका जैसे पेशों को अपना लेते हैं । इनको रोका ही नहीं जा सकता है। जब तक संवेदनशील पदों पर नियुक्ति के लिए लोगों की मनोवैज्ञानिक जॉच नहीं करायी जाती है कि वे इन पेशों में अपनी कुंठा तृप्त करने तो नहीं आ रहे हैं?तब तक बहुत उम्मीद नहीं है। समय-समय पर सत्ता से जुडे लोगों की मनोवैज्ञानिक जॉच भी होते रहनी चाहिए।


रविवार, 28 अगस्त 2011

अन्ना के धोबीपाट से दोनों ही चित हैं।

         रामलीला मैदान से अन्ना द्वारा संचालित अंादोलन ने एक पडाव तय कर लिया है । बहुत  ना नुकुर के बाद संसद को आखिरकार सिविल सोसायटी की बात को सुनना ही पडा , किन्तु-परन्तु करती सरकार को अन्त तक विपक्ष से कल्पनातीत सहयोग मिला । इतना सहयोग कि इस मुद्दे पर संसद में सत्ता और विपक्ष का जैसे कि कोई अन्तर ही नहीं रह गया था। लेकिन लगातार बढते जनदबाव के बाद सरकार के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था कि वह प्रतीकात्मक रूप से ही सही अन्ना की बातों पर ध्यान दे ,और ऐसा करके फिलहाल अपने उपर आयी एक मुसीबत को टालकर  सरकार राहत महसूस कर रही है। यह राहत कितने दिनों के लिए है यह कहना कठिन है। 
                अन्ना के मुद्दों से कितने लोग सहमत हैं कितने नहीं ,आज यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। महत्वपूर्ण यह है कि अन्ना के आंदोलन ने  लोगों को एक सूत्र में कैसे पिरोया बिना झिझक लोग साथ आते गये और कारवंा बनता गया लोगों के पास किसी संगठन का नाम नहीं था न ही किसी दल का झंडा हाथ में था ,संगठनों की सीमा को ही लोगों ने नकार दिया है। कोई नया नारा नहीं,कोई नया झंडा नहीं और कोई नया संगठन नहीं, लगभग चलन से बाहर हो चुकी गॉधी टोपी और राष्ट्रीय ध्वज को इस आंदोलन ने इतनी प्रतिष्ठा दिला दी है कि अब क्रिकेट मैदान में राष्ट्रीय ध्वज लहराने वाले और गॉधी टोपी पहनने वाले नेताओं को थोडी असहजता जरूर होगी। इस पूरे आंदोलन में हिंसा का कहीं भी नामोनिशान नहीं था न नेताओं की भाव भंगिमा में और न ही कार्यकर्ताओं के तेवर में।
                 कहने को यह पूरा आंदोलन वर्तमान शासन प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ है। लेकिन इस अंादोलन का शिकार दोनों ही किस्म के लोग हुए है, लोगों का यह विद्रोह दो-तरफा है , विद्रोह का एक स्वर तो इस शासन व्यवस्था के खिलाफ है ही ,दूसरा स्वर उन कथित क्रान्तिकारियों के खिलाफ भी है जो व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर आंदोलन चलाते रहे हैं और जनसंगठन बनाते रहे हैं, हकीकत में ये केवल लोगों को बॉटते रहे , ये कथित जनसंगठन उन्हीं विकारों से ग्रस्त है जैसे कि  यह संसदीय व्यवस्था हो गयी है। लोग व्यवस्थागत मुसीबतों के कारण तो अनेकों कष्ट भुगत ही रहे हैं लेकिन कथित क्रान्तिकारियों के कारण भी लोगों ने कम कष्ट नहीं भोगे हैं । अन्ना के नेतृत्व में लोगों ने इन दोनों ही प्रवृत्तियों के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इसी कारण अन्ना आंदोलन के विरोध में संसदीय तंत्र तो था ही , लेकिन वे लोग भी बडी संख्या में इस आंदोलन के खिलाफ सक्रिय रहे जिन्हें यह गुमान है कि जनआंदोलन के लिए लोगों को हमारी ही शरण में आना होगा, क्योंकि जनसंगठन की धारणा हमारे पास ही है,लेकिन यह सब धरा रह गया। वास्तव में जिस तरह लोकतंत्र पर गलत लोग हावी हो चुके हैं उसी तरह जनसंगठनों को भी षडयन्त्रकारियों और महत्वाकांक्षियों ने बरबाद कर दिया है। फिलहाल अन्ना के इस नये प्रयोग में मिली सफलता ये उत्साहित लोग जश्न मना रहे हैं। भविष्य में इससे कुछ सबक भी जरूर लेगें।

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अन्ना का हठ या उनका निश्चय।

यह कहना कठिन है कि अब लोग अन्ना के साथ खडे हो गये हैं या अन्ना लोगों की सही नुमाईंदगी कर रहे हैं लेकिन बात का आशय लगभग एक जैसा ही है कि पूरे तंत्र के  खिलाफ जिस दृढता के साथ अन्ना खडे हैं वह अविश्वसनीय जैसा है। नैतिकता में इतनी शक्ति होती है कि एक व्यक्ति ही पूरे सिस्टम के खिलाफ खडा हो सकता है।  अन्ना के जो तेवर हैं उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे सिस्टम के गुरूर पर भी एक हथोडा मारना चाहते हैं । कल तक जो लोग अन्ना का हाल रामदेव जैसा करने की धमकी दे रहे थे अब वे अपने-अपने बिलों में दुबक गये है। रामदेव को अपना साम्राज्य भी बचाना था या कह सकते हैं कि आंदोलन की आड में अपना साम्राज्य बढाना था ऐसे लोग धमकाने में आ सकते हैं ये लोग जॉच से डर जाऐगें लेकिन सर्वहारा जिसका प्रतिनिधित्व अन्ना कर रहे हैं वे ऐसे ही दहाडेगें और संसद को उन्हें सुनना ही होगा। सरकार उन्हें सुन रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार का हृदय परिवर्तन हो गया है। सारे हथकंडे अपनाने के बाद थक हार कर अब सरकार अन्ना से अपील कर रही है। अपील में ऐसी कोई मंशा भी नहीं झलकती है कि सरकार को एक बुजुर्ग नागरिक के असन्तोष की कोई फिक्र है इनका मकसद केवल इतना है कि किसी तरह यह घडी टल जाए, गद्दी बच जाए,सरकार बच जाए और बेईमानों की इससे अधिक फजीहत न हो।
 बहुत से लोग अन्ना से सहमत हैं लेकिन उनके मुद्दों से और तरीके से सहमत नहीं हैं  कुछ उनके सहयोगियों पर शंकालु है। कुछ इस बात से डरे हुए हैं कि इस तरह सिस्टम की प्रतिष्ठा कम हो सकती है। लेकिन इस सब के बावजूद लोगों का अन्ना आंदोलन को समर्थन
बढता ही जा रहा है। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मुझसे कुछ गलतियां हो सकती हैं लेकिन मैं गलत नहीं हॅू ।मुझे व्यक्तिगत तौर पर इस बात से कोई एतराज नहीं है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के अधीन लाया जाना चाहिए। मेरा व्यक्तिगत जीवन पाक-साफ है। इस तरह के बयानों से साफ है कि अब पूरा संसदीय तंत्र नैतिक रूप से हार चुका है। और जब कोई भी तंत्र जानबूझ कर अनैतिकता की रक्षा में जुट जाता है तो समस्या और भी गम्भीर हो जाती है। कुछ लोग अन्ना को हठवादी कह रहे हैं लेकिन वे दृढता से अपनी बात पर नहीं टिके होते तो यह आंदोलन यहॉ तक पहुॅच नहीं पाता, हठ और निश्चय का अन्तर लोग करेगें ही। सरकार जितनी जिद्दी है कि वर्षों से ईरोम शर्मिला अनशन पर हैं लेकिन इनका मुद्दा देश व्यापी नहीं हो पाया इसलिए उन्हें तिल-तिल मारा जा रहा है। यदि अन्ना का इतना असर नहीं होता तो क्या  उनके स्वास्थ्य की चिंता होती ? जाहिर है कि चिंता किसी और ही बात को लेकर है ।



रविवार, 21 अगस्त 2011

चौसर के खिलाडी और अन्ना।

सरकार और विपक्ष की ओर से अन्ना और उनके समर्थकों को लगातार ससंद के सर्वोच्च होने की याद दिलाई जा रही है। और कहा जा रहा है कि यदि हिम्मत है तो चुनाव जीत कर दिखाओ। यह सत्य है कि सरकार और विपक्ष में बैठे हुए लोग चुने हुए प्रतिनिधि हैं। लेकिन हमारे यहॉ चुनाव अब दुर्योधन के चौसर का खेल होता जा रहा है। इसमें बाजी शकुनी ही जीतेगें, अन्ना जैसे लोगों की इसमें कोई जगह नहीं रह गयी है, इस तथ्य को चुनाव के बाजीगर अच्छी तरह जानते हैं। चुनाव शब्द अपने आप में बहुत ही  आकर्षक है,लोकतंत्र भी लुभावना शब्द है, और ससंद शब्द जनता की राय का इतना सटीक प्रतिनिधित्व करता है कि इसकी शान में कहीं भूल से भी गुस्ताखी ना हो जाए इसलिए लोग संसद शब्द का तक सम्मान करते हैं,बावजूद इसके कि संसद के नाम पर ही ये लोग गोलमाल कर गुजरते हैं ।लेकिन सवाल यह है कि चुनाव में जनता का प्रतिनिधित्व कैसे हो रहा है ? कुल मतदान लगभग 50 प्रतिशत का होता है उसमें चार-छः दलों के उम्मीदवार जाति,सम्प्रदाय,बाहुबल,धनबल, सिंपैथी और बोट काटने और बोट जोडने का गणित ,इसमें जो माहिर होगा वही अपने को चुनवा लेगा इसके बाद चुने जाने की सम्भावना ही कहॉ रह जाती है ? और जीतने के बाद भी वह विजेता किसकी गोद में न बैठ जाए यह कहना बहुत जोखिम भरा काम है।
      ऐसे ही तमाम प्रपंचों का शिकार हमारा लोकतंत्र होता जा रहा है, जो लोग चुनाव में गर्दन ही नहीं कमर तक झुके रहते हैं चुने जाते ही वे इतने अहंकार से भर जाते हैं कि खुद को ही सर्वोच्च मानने लगते हैं इनकी चिंता न तो लोकतंत्र को लेकर है और ना ही ससंद की गरिमा से इनको कुछ भी लेना-देना है। ये केवल अपनी सर्वोच्चता साबित करना चाहते है। यह सवाल उठाया जा सकता है कि ये कैसे प्रतिनिधि हैं जिनको ये भी पता नहीं कि जनता कितनी मुसीबतों में है। और जिसके धैर्य का बॉध अब टूटने के ही कगार पर है। लेकिन ये लोग शायद स तरह नहीं सोचते हैं इन्हें लगता है कि ये पॉच वर्षों के लिए तानाशाह बना दिये गये है।
      अन्ना का आंदोलन चाहे जिस मुद्दे से भी शुरू हुआ हो अब यह जनता की सर्वोच्चता फिर से साबित करने की ओर बढ रहा है। न्याय का अनादर नहीं किया जा सकता है वह सर्वोच्च है इस तर्क के बहाने बहुत से कथित न्यायाधीशों ने भ्रष्टाचार और मनमानियां की जो भ्रष्टाचार करे ,मनमानी करे वह न्यायाधीश कहलाने योग्य ही नहीं है, अदालत की अवमानना का खौफ दिखाकर कुछ जजों ने कुछ दिन अपनी मनमानी चला ली लेकिन यह साबित हो गया कि ऐसे लोगों को न्याय की सत्ता से कुछ भी लेना-देना नहीं था। केवल उसकी महत्ता की ओट में अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना था। आज जो लोग लोकतंत्र,चुनाव और संसद की इुहाई इे रहे हैं । इन्हें भविष्य में इन शब्दों की गरिमा को चोट पहुॅचाने के लिए जवाब देना पडेगा, इनकी बातों का कोई जवाब देने के लिए अन्ना बाध्य नहीं है। लेकिन यह तय है कि आज भी चुनावों में इन नेताओं को टक्कर देने की हिम्मत किसी में भी नहीं है, चौसर के खेल में तो शकुनी ही जीतेगा युधिष्ठिर कैसे जीत सकतंे हैं ?

मनमोहन का खत्म होता सम्मोहन!


1990 के दशक में मनमोहन सिंह नई आर्थिक नीतियों के पुरोधा थे, रातोंरात देश में इनके नेतृत्व में नया आार्थिक मॉडल थोप दिया गया। हांलाकि लोगों का पुराने आर्थिक ढांचे से सम्मोहन टूट भी रहा था, क्योंकि सोवियत संघ के माडल से प्रेरित हमारी अर्थव्यवस्था संघ के बिखरने के साथ ही अपनी आन्तरिक कठिनाईयों से भी गुजर रही थी, लेकिन अर्थशास्त्री होने की छवि का लाभ उठाकर मनमोहन सिंह ने ईमानदार होने और कुटिल राजनीतिज्ञ न होने की छवि का भरपूर लाभ उठाया, कालान्तर में ये कितने ईमानदार ओर निष्कपट नेता रहे इसका फैसला तो इतिहास करेगा लेकिन उन्होने जितनी निर्ममता से अपनी मनोगत सोच के आधार पर इस देश में नीतियां लागू की उसके आधार पर इस आरोप में भी काफी दम है कि इतना बेरहम कोई निर्मम तानाशाह ही हो सकता है। लोकतंत्र में इस तरह से नीतियां आरोपित करना लोकतंत्र के एकदम विपरीत है।
मनमोहन सिंह ने एक वित्त मंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में जो चाहा वह किया। शुरूआत में कुछ स्वदेशी आंदोलन टाईप के विरोध के बाद लगभग पूरा विपक्ष मनमोहन सिंह की ही धुन पर ही थिरकने लगा, इसी कारण हमारे देश में विपक्ष और सत्ता में कोर्इ्र भी विरोध नहीं रह गया है, क्योंकि आज भी तथाकथित विपक्ष के पास कोई समानान्तर अथवा नेतृत्व दे सकने लायक विचार नहीं है।सत्ता में कोई भी आये नीतिंया यही लागू होंगी। विचार के ऐसे दिवालियापन में लोकतंत्र कैसे चल सकता है? शायद यही कारण है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगभग सभी पार्टिंयां कॉरपोरेट घरानों में तब्दील होती जा रही है। जिस तरह पूॅजीपति साल भर मजदूरों का निर्मम शोषण करके दिवाली में कुछ रूपये का बोनस दे देता है उसी तरह लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावों में लोेगों को लालच देती हैं साडी ,टेलीविजन से लेकर स्कूल में बच्चों को भोजन,2 रू0 किलो आटा ,चावल देने की धोषणा इनकी पूरी सोच दर्शाती है। सरकार आज भी उसी मानसिकता से संचालित लगती है कि जैसे यहॉ महारानी का शासन हो यदि आपने इनको खुश किया तो ये आपको कुछ खैरात दे देगंे। खुलेआम सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि हमने दिल्ली से इतना पैसा भिजवाया, यह समझ से बाहर है कि किसी राज्य को पैसा भिजवाने में इनका क्या एहसान है?एक-एक पैसा पूरे राष्ट्र की सम्पत्ति है जहॉ आवश्यकता होगी उस पैसे को वहॉ जाना ही चाहिए, इसमें श्रेय लेने अथवा ऐहसान जतलाने से जाहिर होता है कि ये चाहेगें तो पैसा नहीं भी दे सकते हैं!यही हाल राज्य सरकारें अपने अधीन संस्थानों के साथ खुलेआम करती है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि लोगों का अन्ना के साथ होने में महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि लोग मनमोहन सिंह के विरोध में हैं।


शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

दबंग खुर्शीद।

लोकपाल विधेयक के आंदोलन पर केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की यह टिप्पणी कि अन्ना के 10 समर्थकों की जगह हमारे पास 100 है, यह बयान बताता है कि आंदोलनों के प्रति सरकार का किस तरह का रवैया है। किसी मुद्दे को लेकर यदि लोग सडकों पर हैं तो सरकार की ओर से संवाद की जरूरत है, बहुत समझने और थोडा समझाने की जरूरत है न कि ताल ठोकने की । जिस मुद्दे से उद्वेलित होकर लोग सडकों पर आये हैं क्या ये लोग सलमान खुर्शीद के 100 लोगों की धमकी पर  घरों को लौट जाऐगें ? सरकार अब संख्याबल के आधार पर लोगों से व्यवहार करेगी ?समस्या को सुलझाने के बदले प्रतिक्रिया में ”अपने लोगों“ को इकठ्ठा करेगी ? यह बयान विरोध को कुचल डालने वाली मानसिकता की यह वीभत्स अभिव्यक्ति है । चाहे सलमान इस तरह का काम कर पायें अथवा नहीं  लेकिन यह सोच बहुत ही खतरनाक है। ऐसे लोगों के हाथों में सत्ता अनर्थकारी ही हो सकती है। जरूरी नहीं है कि सलमान लोगों के बीच मारपीट करवा दे अथवा अराजकता पैदा कर दे। लेकिन यह साफ है कि यह समझ विरोध होने पर किस कदर  तिलमिला जाती है, यह बडा सवाल है। इनकी भद्रता और इनका लोकतंत्र तभी तक है जब तक लोग  इनकी हॉ में हॉ मिलाते रहें।
  बहुत से लोग इस आंदोलन  पर गलत कारणों से टिप्पणी कर रहे हैं,अन्ना के साथियों पर सवाल उठा रहे हैं। इस आंदोलन को फिजूल बता रहे है। ये वे लोग हैं जो किसी दूसरे को  स्वीकार नहीं कर सकते हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अन्ना किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अपनी बात कहने के लिए किसी का प्रतिनिधि होना जरूरी है? यह सत्य है कि समाज वर्गों में बॅटा है लेकिन आम सहमति का कोई भी बिन्दु नहीं हो सकता है? जो लोग शंका और सवाल कर रहे हैं वे गतिमान होते समाज में कोई भी भूमिका नहीं निभाना चाहते हैं  केवल टिप्पणी करने के। कुछ लोग इस आंदोलन में क्रान्ति की सम्भावना तलाश करने लगे हैं । उनके अपने पैमाने हैं ,अपनी मान्यतायें हैं ,धारणायें है दिलो- दिमाग में बसी हुई कुछ छवियां है। इससे बाहर देख पाना इनके लिए असम्भव है। इसीलिए एक मंत्री आंदोलन के लिए टपोरी टाईप भाषा बोल लेते है तो दूसरे किस्म के लोग विश्लेषणों में व्यस्त हैं। लेकिन अन्ना के कदम ने भारतीय संसदीय राजनीति में सत्ता और विपक्ष के नापाक गठजोड को तो तार-तार कर ही दिया है। सत्ता और विपक्ष की मिट चुकी सीमारेखा को अन्ना ने फिर से खींचा है । कम से कम एक सजग विपक्ष की कमी को अन्ना ने रेखांकित किया है। चाहे सलमान की टिप्पणी हो या आंदोलन के आलोचकों के विश्लेषण इनमें एक स्वर साफ सुनाई दे रहा है कि यह हलचल कुछ लोगों को अपने हितों के खातिर रास नही आ रही है। लेकिन अधिकांश लोग मानते हैं कि कुछ न होने से कुछ होना बेहतर ही है।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

लोक खतरे में हैं और ये तंत्र की चिंता में डूबे हैं।

अन्ना के आंदोलन से कुछ रास्ते तो  निकले हैं और उम्मीद की जा सकती है कि बहुत से सवालों का जवाब इस आंदोलन से निकलेगा । लेकिन बहुत से यथास्थितिवादी लोग इस हलचल से घबरा गये हैं । यह घबराहट इनके वक्तव्यों से भी जाहिर हो रही है। जिस बात का कोई प्रसंग ही नहीं उसे ये लोग जबरन मुद्दा बनाने की कोशिशे कर रहें है। इनका कहना है कि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद का है। यदि संसद के इस अधिकार को कोई चुनौति देता तो यह बहस जरूर की जानी चाहिए।  अपने अधिकारों के लिए इतने संवेदनशील जनप्रतिनिधि कभी इस बात की जिम्मेदारी नहीं लेते हैं कि नागरिकों के प्रति  इनके कुछ कर्तव्य भी हैं। लोग मंहगायी से त्रस्त हैं उनकी जमीनों पर छलकपट से कब्जा किया जा रहा है। बेरोजगारी, बेबसी लाचारी के कारण अनगिनत मौतें हर मिनट हो रही हैं गलत नीतियों के कारण बडी संख्या में लोग संत्रास और अवसाद में डूबते जा रहे हैं। इसकी जिम्मेदारी किसी की नहीं है? केवल संसद के नाम पर अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित करने के लिए ही ये एकजुट हो जाते है। बहुत से ऐसे संासद हैैं जिन्होनें राजनीति में आकर गलत तरीकों से जनता की सम्पत्ति अथाह मात्रा में अपने पास इकठ्ठा कर ली है। फिर इनको केवल संासद होने के नाम पर संरक्षण क्यों मिलना चाहिए?  या फिर यह क्यों न मान लिया जाए कि ये जो भी कानून बनाऐगें इसमें जनता के लिए नहीं बल्कि ये अपने स्वार्थ के लिए ही काम करेंगें,चाहे इन्होनें शपथ कुछ भी ली हों। आज मुदृदा यह है कि  अपराधी संसद भवनों तक जा पहुॅचे हैं उनकंे खिलाफ यदि संसद के अन्दर से कार्यवाही नहीं की जा रही है तो बाहर से इस समस्या पर लोगों का ध्यान दिलाना गलत कैसे हो सकता है ?ं लेकिन अन्ना जो कह रहे हैं इसे सरकार सुनना ही नहीं चाहती और समझना तो बिल्कुल ही नहीं चाहती है।  संसद सर्वोपरि है इस बात को लेकर किसी का भी मतभेद नहीं है और न ही संसद  के अधिकारों को लेकर कोई  द्विविधा है। अन्ना का केवल इतना कहना है कि संसद की गरिमा को संासद ही मटियामेट करने पर तुले हैं इन्हें जनलोकपाल के जरिए नियन्त्रण में रखना होगा।  संसद जनता की संस्था है,संासदों की नहंी ,वे केवल प्रतिनिधि हैं इससे अधिक यदि वे कुछ भी होना चाहते हैं तो इन पर भी नियन्त्रण किया जाना चाहिए। संासद बिना वजह ही संसद को अपनी संस्था बता रहे हैं । यदि संसद के सदस्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा रहे हैं , तो क्या यह बहस नहीं की जानी चाहिए कि इसको नियन्त्रित किये जाने की जरूरत है। हमारे ही देश में मंदिरों पर गलत लोगों के नियन्त्रण को हटाने के लिए क्या आपरेशन नहीं किये गये? जनलोकपाल विधेयक भी एक लोकतान्त्रिक आपरेशन ही है।ऐसे ही बहुत से और भी आपरेशन किये जाने की जरूरत है अभी तो अन्ना ने केवल एक ही तरीका सुझाया है।  इसमें कमियां हो सकती है लेकिन इस की भावना को नजरअंदाज करने वाले लोग संसद के नाम पर लोगों को भयभीत चाहते हैं ,लगभग उसी तरह जैसे कि राजतंत्र में राजद्रोह के दण्ड का भय लोगों को दिखाया जाता था। लोकतंत्र में संसद का अपमान कोई भी कैसे कर सकता है ?यह तो अपना ही अपमान करने जैसा है। राजनीति के अपराधिकरण पर तो ऐसे लोग खूब चर्चा कर लेते हैं लेकिन इसकी चरम परिणति संसद में गलत लोगों के प्रभुत्व तक पहुॅच सकती है इस पर क्यों नहीं कुछ बोलते है ? इस बात पर भी लोग सहमत हैं कि चुनाव प्रक्रिया में गलत तरीकों से गलत लोग आसानी से जनता के प्रतिनिधि बन रहे हैं , जिन  पर व्यभिचार ,हत्याओं और भ्रष्टाचार के आरोप हैं ,तो केवल संासद होने के कारण इन्हें पॉच वर्षों तक निरंकुश तरीके से काम करने दिया जाना चाहिए ? इस आंदोलन का इतना ही कहना है कि इनके जनप्रतिनिधियों के निरंकुश होने का खतरा बढता जा रहा है। इसलिए तात्कालिक तौर पर कुछ कदम उठाये जाने की जरूरत है  जनलोकपाल विधेयक इस दिशा में पहला कदम है ।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

भ्रष्टाचार विरोध से सरकार क्यों चिढ जाती है?

अन्ना के आंदोलन से सरकार बेवजह ही तिलमिलाई हुई है। जबकि सरकार से अन्ना का  कोई विरोध है ही नहीं ,विरोध तो भ्रष्टाचार से है।  भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना भी हैं और सरकार भी इसके खिलाफ बयान देती ही रहती है फिर सरकार इस आंदोलन के खिलाफ क्यों होती जा रही है यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना लोगों को सक्रिय कर रहे है। इससे सरकार परेशान क्यों है ?सरकार भी यह कहती है कि  भ्रष्टाचार इस देश में एक बडी समस्या है। लेकिन जब भी सरकारों पर कोई संकट आता है चाहे वह नरसिंहाराव के समय में झामुमो सांसदों का मामला हो या यूपीए के प्रथम कार्यकाल में बामपंथियों के समर्थन वापस लेने से उपजा संकट हो ,या फिर कर्नाटक में जैसा भाजपा के साथ हुआ ऐसे समय में भ्रष्टाचार करके ही ये सत्ताधिकारियों बच सके हैं ,ऐसे में जनता इनकी गद्दी बचाने में सहयोग नहीं करती है सिर्फ भ्रष्टाचार के जरिए इकठ्ठा किये हुए धन से ही ये  लोग खरीद फरोख्त कर पाते हैं। जो भ्रष्टाचार इन्हें संकट से बचाता है उसे बचाना न सिर्फ इनका नैतिक कर्तव्य है बल्कि इनके अस्तित्व के लिए भी जरूरी है।घाघ मंत्री तो कभी फॅसते ही नहीं है लेकिन कभी कभार कोई नौसिखिया मंत्री किसी घोटाले में फॅस ही जाता है तो भ्रष्टाचार करके ही ये बच भी पाते हैं । शायद इसलिए ही सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बयान तक तो लोगों के साथ है लेकिन कोई अन्ना यदि इससे आगे बढने की कोशिश करे तो इसे व्यवस्था के खिलाफ बगावत माना जाएगा। आखिर जिस भ्रष्टाचार के सहारे सरकारें चलती हैं व्यवस्था चलती है। उस पर ऑच कैसे आने दी जा सकती है सरकार इसके खिलाफ बयान दे रही है इतने से ही लोगों को संतुंष्ट हो जाना चाहिए।
 2 जी प्रकरण में कोई घोटाला हुआ ही नहीं है यह दावा करने वाले कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि अन्ना को आंदोलन करने का लोकतांत्रिक अधिकार तो है लेकिन हम सुविधानुसार जगह नहीं दे सकते हैं। इस आंदोलन के बाद जगह तो सिब्बल जी को अपने लिए ढूंढनी ही पडेगी। दूसरों को जगह देने या न देने का इतना अहंकार लोकतंत्र में कैसे टिका रह सकेंगा ? जब मिश्र जैसे देशों में यह अहंकार वहॉ के शासकों को नहीं बचा पाया । इस तरह के लोग बहुत ही चालाक होते हैं जो अपने खिलाफ किसी भी विरोध को लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरोध का नाम दे देते है। संसद की अवमानना, विधायिका के कामों में हस्तक्षेप संसद के बाहर कानून बनाने की कोशिश करना और ससंद को नियन्त्रित करना जैसे शब्द किसी को भी सनसनीखेज लग सकते हैं । लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह वे लोग कह रहे हैं जिनके लोकतंत्र की अपनी मनगढंत परिभाषा है। अपनी गद्दी बचाने के लिए लोकतंत्र की दुहाई देना भी कम भ्रष्टाचार नहीं है। यदि लोकतांत्रिक मूल्यों का इन्होनें जरा भी मान रखा होता तो आज देश चौराहे पर खडा न होता। किसी तरह अपने कार्यकाल के पॉच साल पूरे कर लेने और फिर चुनाव जीत लेने को देश चलाना कैसे कहा जा सकता है ? लोगों को बेवकूफ बनाना जरूर कहा जा सकता है।






शनिवार, 13 अगस्त 2011

जनतंत्र नहीं ,इतने अंहकारी नेता ही हो सकते है।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के लिए अन्ना को इस आफिस और कभी उस ऑफिस में अनुमति के लिए भटकना पड रहा है। सरकार की ओर से सुझाव है कि इस सम्बन्ध में उपयुक्त कार्यालय से संपर्क करें। उनकी समस्या आसानी से हल हो जाऐगी। इसी उपयुक्त कार्यालय की तलाश में आम आदमी पिछले चौंसठ वर्षों से भटक रहा है । लेकिन वह ऑफिस अब तक किसी को नहीं मिल पाया है। जहॉ से समस्या का समाधान हो जाता है, फिर अन्ना को यह कैसे  मिल जाऐगा जबकि वे आम आदमियों जैसी ही बात कर रहे हैं । यदि वे रेड्डी बंधु जैसे होते तो उन्हें ऐसे किसी कार्यालय से अनुमति की शायद जरूरत ही ना होती एक कार्यालय ही नहीं वे पूरे प्रदेश को बंधक जैसी स्थिति में रख सकते थे। तेलंगाना के नाम पर जो लोग खुलेआम उपद्रव करवा रहे हैं उन्हें किसी भी कार्यालय अनुमति की जरूरत नहीं होती है। कोई गॉवों को बंधक बनाये बैडा है, कोई जिले को ,और कोई राज्य स्तर पर यह धंधा कर रहा है। केन्द्र भी इससे अछूता नहीं है। रामदेव को कार्यालय जाने के लिए नहीं कहा गया था,उन्हें हवाई अड्डे पर रिसीव करने चार केन्इ्रीय कैबिनैट मंत्री हवाई अड्डे पर मौजूद थे ।
समाज के एक वरिष्ठ नागरिक कुछ कह रहे हैं उस पर ध्यान देने की बजाए इस तरह जलील करना किसी की भी समझ में नहीं आ सकता है। केन्द्रीय सरकार कोई राजवंशीय संस्कारों से संचालित नहीं है और ना ही तानाशाही मनोवृत्ति के लिए हमारे समाज में कोई जगह है। फिर कुछ-ऐक राजाओं को छोडकर होशो-हवास में रहने वाले राजा भी इस तरह नहीं बोलते थे वे भी रात को भेष बदलकर लोगों के सुख-दुखों को महसूस करने निकल पडते थे, इसमें नाटक जैसा कुछ भी नहीं यह सामान्य सी प्रक्रिया थी।
हमारी लोकतांंित्रक प्र्रक्रिया में यह एक बुनियादी गडबड आ गयी है कि सरकारें अपना वजूद दिखाने की कोशिश करने लगी है, जो कि वास्तव में होता ही नहीं है। सरकारें लोगों की सामूहिक इच्छा और क्षमता का ही प्रतिबिम्ब हैं। सरकार को लोकतंत्र में पॉच साल बाद शायद इसलिए ही भंग कर दिया जाता है जिससे  सरकार के निरन्तर और निरंकुश होने की धारणा टूटती रहे। जिसके बोलने में भी परायापन हो वह जनता की सत्ता नहीं हो सकती है। केवल नाम जनतंत्र हो सकता है।


कम्पनियां मालामाल और सरकारें बदहाल।

इटली के पचास हजार लोग निकट भविष्य में अपनी नौकरियां खो देगें। इन नीतियों का प्रस्ताव वहॉ की निर्वाचित सरकार की ओर से आया है। जनसंख्या के अनुपात में यह शायद उनके लिए नाकाबिले बर्दाश्त झटका हो सकता है। फिलहाल तो यह दर्शाता है कि अधिकांश देशों की सरकारी नीतियों में आजकल एक रहस्यमय समानता आ गयी है। जो सरकारें कर्ज संकट में हैं उन्हें आगे काम चलाने के लिए पैसा चाहिए। कर्ज देने वाली संस्थाओं की शर्त है कि सरकारी खर्च को कम करो, तभी कर्ज मिलेगा। मतलब साफ है कि सरकारों को अब अपनी सामाजिक भूमिका समाप्त करनी होगी ,वे अब स्कूल नहीं खोल सकती अस्पताल नहीं चला सकती, खेल संस्थाओं पर अब उनकी कोई भूमिका नहीं होगी ,जितने भी लोक कल्याणकारी दायित्व सरकारों के निश्चित थे ,अब सरकारें इन वायदों से पीछे हटने लगी हैं ।ऐसे में यह सवाल उठ सकता है कि जब सरकारों को कुछ करना ही नहीं है तो फिर इनकी भूमिका क्या बचेगी ? सरकार जनता के कामों को बोझ बता रही है, क्या वास्तव में सरकारें जनता के लिए बोझ साबित नहीं हो रही हैं? फिलहाल तो सरकारों का काम इतना भर रह गया है कि है कि लोगों से टैक्स वसूलें और राष्ट्रीयं दिवसों पर देश के झंडे के नीचे खडे होकर पुलिस और फौज की सलामी लें।
 दुनियां भर में जो सरकारें आर्थिक संकट में हैं वे यह नहीं बताती है कि देश कर्ज में क्यों फॅस गया ? सरकारें अन्त तक इन संकटों पर चुप्पी क्यों साधे रहती है ? जिन कारणों से यह स्थिति आती है उसके लिए जिम्मेदार कौन है सरकार या जनता ? कोई भी सरकार ऐसी नहीं है जिसने एक प्रकार से देश की सम्प्रभुता को गिरवी रखकर कर्ज लेने से पहले अपने लोगों के बीच जनमत संग्रह कराया हो कि आगे की नीतियां तय कैसे की जांए? यह सारा काम सरकार और विपक्ष में बैठे पेशेवर राजनीतिज्ञ आपस में मिल बैठ कर तय कर लेते हैं और अपने निर्णय की घोषणा कर देते हैं। यह रूझान इसलिए भी खतरनाक है कि जिसे जनता अपनी निर्वाचित सम्प्रभु सरकार माने बैठी है। उसके हाथों में तो अब कुछ रह ही नहीं गया है। सारी दुनियां ने देखा कि पाकिस्तान में दो स्थानीय नागरिकों की खुलेआम हत्या करने वाले अमेरिकी को इस सरकार ने कैसे छोड दिया और खुलेआम पाकिस्तान में अमेरिका सैन्य आपरेशन कर लेता है और आर्थिक रूप से अमेरिका पर निर्भर सरकार औपचारिक विरोध तक ही सीमित रह जाती है । लेकिन अपने नागरिको के किसी भी प्रदर्शन का जवाब गोलियों से देने में जरा भी नहीं हिचकिचाती हैं, यह मात्र उदाहरण ही हैं कमोवेश सरकारों का यही चरित्र रह गया है फिर सवाल उठता है कि ऐसी सरकारों की जरूरत कितनी रह जाती है।
 हमारे देश में भी यही नीतियां बहुत पहले से ही लागू की जा चुकी हैं । और वे  कारण अभी तक मौजूद हैं जिनके कारण देश का सोना गिरवी रखने तक की नौबत आ गयी थी। सवाल यह नहीं है कि कौन या वर्ग मुनाफा बटोरने में लगा है और कौन भूखा है। भूख,लाचारी,बेबसी और आत्महीनता हमारे देश में क्यों पसरते जा रही है? एक व्यक्ति अपने रहने के लिए एक अरब डालर की लागत का मकान बनाता है और देश को कर्ज के लिए के कर्जदायी संस्थाओं के सामने रिरियाना पडता हैै। कर्ज पाने के लिए अमेरिकी सदन में हफ्तों बहस चलती है और अमेरिकी एपल कम्पनी की तिजोरी में देश की कुल नगद धनराशी  से अधिक के नोट ठुंसे रहते हैं ! इस पहेली का जवाब ना जाने किसके पास होगा! 



गुरुवार, 11 अगस्त 2011

मुद््दा भ्रष्टाचार है ,लोकपाल नहीं।

16 अगस्त से मजबूत लोकपाल के पक्ष में अनशन की तैयारी जोरों पर है। सरकार की ओर से भी लोकपाल गठन पर एक प्रारूप तैयार है। किसी को भी अब लोकपाल गठन पर कोई एतराज नहीं है। इस पर लगभग सहमति है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल एक हथियार हो सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे जनअसंतोष को केवल लोकपाल तक ही सिमित करने से इस आंदोलन के कमजोर होने की आशंका हो सकती है। आज सारा ध्यान लोकपाल पर ही केन्द्रित किया जा रहा है, जबकि इस पर कोई बहस थी ही नहीं ,बहस इस बात पर है कि भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त किया जाए। लोकपाल मात्र एक सुझाव है जिससे कि भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। यह कोई जॉची-परखी तरकीब नहीं है कि इससे भ्रष्टाचार को रोक ही लिया जाएगा । खतरनाक बात यह है कि आज लोकपाल का मुद््दा भ्रष्टाचार से अधिक चर्चा में है। जहॉ से भ्रष्टाचारियों को घेरा जा सकता है उन सभी विकल्पों पर बात बन्द कर दी गयी है । अब लगता है कि लोकपाल ही मानो साधन और साध्य हो गये हैं। जबकि लोकपाल तो मात्र भ्रष्टाचार मिटाने का एक साधन है। दरअसल भ्रष्टाचार जितना व्यापक है उतनी ही व्यापक लडाई इसके खिलाफ होनी चाहिए तभी इस बुराई से छुटकारा मिल सकता है। हमें हर वह प्रयास करना है जिससे भ्रष्टाचारी हतोत्साहित हों यह काम केवल लोकपाल के भरोसे नहीं छोडा जा सकता है। यह किसी भी लोकपाल की सीमा और सामर्थ्य से बाहर की बात है। लोकपाल गठन तो इस दिशा में एक सुझाव और प्रयोग जैसा ही है इससे अधिक की उम्मीद करना ठीक नहीं है। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जनअसंतोष को यदि इस तरह समझा गया है कि सरकारी ढांचे में कुछ फेर बदल कर लोगों के गुस्से को ठंडा किया जा सकता है तो यह गलत है सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार है और सरकार भ्रष्टाचार को प्रश्रय भी देती है लेकिन समस्या को हल करने और इसके समर्थकों को पराजित करने के लिए इस लडाई को जल्द ही दूसरे चरण में ले जाने की भी जरूरत है। इसके आभाव में भटकाव की आशंका हो सकती है।
सरकार ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझ लिया है कि भ्रष्टाचार सरकारी और गैरसरकारी नहीं हो सकता है। इसलिए वह इस आंदोलन के प्रति गम्भीर भी नहीं है। जब तक हर प्रकार के भ्रष्टाचार पर सभी तरीकों से चोट नहीं की जाती तब तक लोगों की बैचैनी को आंदोलन में बदलने का काम बाकी ही रहेगा। अन्ना ने एक बेहतरीन शुरूआत की है। जाति, धमर्, क्षेत्र के नाम पर निकृष्ट किस्म की राजनीति का जो लम्बा दौर इस देश में चलाया गया, अन्ना उससे देश को बाहर निकाल लाए हैं यह एक बहुत बडी उपलब्धि है। भ्रष्टाचारियों के लिए लोगों के मन में हिकारत का भाव इस आंदोलन के कारण ही आया है। आगे की डगर में फिसलन हो ही सकती है। लेकिन इस डगर को छोडा भी कैसे जा सकता है।


मंगलवार, 9 अगस्त 2011

खतरा अर्थव्यवस्था पर नहीं ,खतरनाक यह अर्थव्यवस्था है।

आज दुनियां भर में अमेरिका के नेतृत्व वाली सभी अर्थव्यवस्थाएं लगभग उसी तरह के संकट में हैं जैसे कि 90 के दशक में सोवियत संघ मॉडल की अर्थव्यवस्थाएं आ गयी थी। इन संकटों के कारण पूर्वी यूरोप सहित सोवियत संघ का न सिर्फ भूगोल ही बदल गया बल्कि अर्थ तंत्र और राजनीतिक व्यवस्थायें तक बदल दी गयी ,यह दूसरी बात है कि बदले में उन्होनें संकट को न सुलझा कर केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही अपना लिया ,उस वक्त अमेरिकी नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्थायें जो कि आज खुद वैसे ही संकट में हैं उस समय इसे अपनी विचारधारात्मक विजय के रूप में प्रचारित कर रही थी। जबकि यह साबित हो चुका है कि वह अर्थव्यवस्था अपने ही अर्न्तविरोधों के कारण डूबी और आज अमेरिकी नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्था भी अपने ही अर्न्तविरोधों के कारण डूब रही है। एक दूसरे से इनका कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह कहना भी शायद उचित न होगा कि अर्थव्यवस्थायें संकट में है। गलत अर्थव्यवस्थाओं के कारण दुनियां उस समय भी संकट में थी और आज फिर यह संकट सामने है। यदि यह केवल अर्थव्यवस्थाओं का संकट होता तो इसे दुरस्त कर लिया जाता। लेकिन इन अर्थव्यवस्थाओं के मठाधीश अन्त तक दुनियां को अपनी पकड से मुक्त नहीं होने देना नहीं चाहते हैं यही चिंता का मुख्य कारण है, इसीलिए संकट पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है कि यह परिस्थिति पैदा क्यों हुई है? केवल संकट से बाहर निकलने पर ही चर्चा की जा रही है। यदि आज कोई ऐसा रास्ता निकल भी आये कि विश्व के पूॅजीबाजार में फिर से चहल-पहल होने लगे तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं होगा कि विश्व अर्थव्यवस्था के कारण बेरोजगारी , मंहगायी ,असुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के छिन्न भिन्न हो जाने पर कोई रोक लग पायेगी। वास्तव में जिन्हें सरकारों की अर्थव्यवस्था कहा जाता है वे पूॅजीपतियों की अर्थव्यवस्था ही है। दुनियां में दो अर्थव्यवस्थाएं हैं एक आम आदमी की अर्थव्यवस्था जो हमेशा ही संकट ग्रस्त रही। इसके कारण अधिसंख्य आबादी कदम-कदम पर न सिर्फ अपमानित होती है। बल्कि आभावों के बीच ही जद्दोजहद में ही जिन्दगी गुजर जाती है। वे लोग अपने को खुशनशीब समझते हैं जिनकी जिन्दगी गुजर पाती है अधिकांश लोग तो जिन्दगी पूरा होने से पहले ही गुजर जाते हैं। इस संकट को लेकर कभी इस तरह हायतोबा नहीं मचती है,क्योंकि यह आम आदमी की अर्थव्यवस्था है। लेकिन पूॅजीपतियों की अर्थव्यवस्था को सरकार अपनी अर्थव्यवस्था कहने से भी गुरेज नहीं कर रही है। आम आदमी को लेकर तो कभी इतनी चीख पुकार नहीं मचती है। यदि सरकार यह समझती है कि पूॅजीपतियों के तानेबाने के बीच वह पूरी तरह उलझ गयी है तो पूरा सच लोगों के सामने क्यों नहीं लाती है कि मुनाफाखोरी के कारण ही यह संकट पैदा हुआ है। यदि कोई यह समझता है कि इस अर्थव्यवस्था के पतन को रोका जा सकता है तो यह गलत है इसे केवल टाला जा सकता है और टालने के ही प्रयास किये जा रहे हैं। कुछ लोग समझते हैं कि वर्तमान अर्थसंकट से उथल-पुथल हो जाऐगी तो उन्हें शायद अनुमान भी नहीं होगा कि इस अर्थव्यवस्था के कारण जो उथल-पुथल
हो रही है। उसका तो अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।